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राजस्थान की मिट्टियाँ व मिट्टियों के प्रकार 2023

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राजस्थान की मिट्टियाँ व मिट्टियों के प्रकार 2023

राजस्थान में कितने प्रकार की मिट्टियां पाई जाती है, काली मिट्टी कहां पाई जाती है , लाल मिट्टी कहां पाई जाती है , राजस्थान में वर्टिसोल्स मृदा कहां पाई जाती है , राजस्थान में एरिडो सोल्स मृदा कहां पाई जाती है , लाल तथा काली मृदा कहां पाई जाती है।

राजस्थान की मिट्टियाँ व मिट्टियों के प्रकार हम आपको इस आर्टिकल में विस्तार से बताएंगे। राजस्थान की मिट्टियाँ व मिट्टियों के प्रकार से जुड़ी संपूर्ण जानकारी जानिए हमारे इस लेख में।

राजस्थान की मिट्टियाँ व मिट्टियों के प्रकार 2023
राजस्थान की मिट्टियाँ व मिट्टियों के प्रकार 2023

मिट्टी/मर्दा से संबंधित सामान्य जानकारी-

भारत में मिट्टी का अध्ययन एवं अनुसंधान करने वाली सीड़ संस्था (I.C.A.R) भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद है। इसकी स्थापना 1956 में दिल्ली में की गई थी।

मिट्टी में एक पादप को पनपने हेतु कैल्शियम, फास्फोरस, चूना पत्थर, सिलिकेट्स, पोटाश, नाइट्रोजन, ऑक्सीजन, मैगनीज, कोबाल्ट, फेरस ऑक्साइड, एलमुनियम आदि तत्वों की आवश्यकता होती है।

मिट्टी का सबसे महत्वपूर्ण पोशाक तत्व हायूमस होता है।

भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद द्वारा मृदा संरचना अनुपात में खनिज पदार्थ 45% जबकि कार्बनिक योगिक 5% तथा मृदा जल और मृदा वायु 25-25% जरूरी है।

I.C.A.R ने मृदा कणों की मोटाई के आधार पर वर्गीकरण निम्नानुसार दिया है-

  1. क्ले/चिका मृदा कण- सबसे छोटे मृदा कण
  2. सिल्ट मृदा कण
  3. सेण्ड मृदा कण
  4. कोर्स सेण्ड मृदा कण
  5. फाइन ग्रेवल मृदा कण
  6. ग्रेवल मृदा कण- सबसे बड़े मृदा कण

मृदा कणों की मोटाई के आधार पर राजस्थान की मृदा को तीन भागों में बांटा गया है-

  1. अत्यंत बारिक कणों वाली मृदा
  2. मध्यम आकार के कणों वाली मृदा
  3. मोटे आकार के कणों वाली मृदा

राजस्थान की मिट्टियाँ व मिट्टियों के प्रकार के बारे में जानकारी-

राजस्थान की मिट्टियों को मुख्य रूप से तीन भागों में बांटा गया है जो निम्न है-

1. अत्यंत बारिक कणों वाली मृदा- इस मिट्टी को काली मिट्टी, रेगुर मिट्टी, स्वत जोत वाली मिट्टी तथा वर्टिसोल्स मिट्टी के नाम से जाना जाता है। मिट्टी के सबसे पारीक कणों को क्ले या चीका कहा जाता है कोर्सिका प्रधान मिट्टी को चिकनी मिट्टी कहा जाता है। इस मिट्टी का रंग काला होता है। जिसका कारण है फेरस लोहांश।

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काली मिट्टी ज्वालामुखी के विस्फोट से निकले लावा के ठंडे होकर जमने से बनी चट्टान के विखंडन से हुआ है। जब काली मिट्टी में उपस्थित लोहांश कालांतर में तापमान एवं वर्षा के कारण लोहे ऑक्साइड में बदल जाते हैं तो काली मिट्टी का ही रंग लाल हो जाता है।

इस मिट्टी की जल ग्रहण करने की क्षमता कम तथा धारण करने की क्षमता अधिक होती है।

अत्यंत बारिक कणों वाली मिट्टी यानी काली मिट्टी में वह फसलें अधिक होती है जिन्हें बार-बार सिंचाई की आवश्यकता होती है जैसे कपास, गन्ना, चावल, मूंगफली आदि।

राजस्थान में काली मिट्टी का फैलाव हाडोती पठारी क्षेत्र के कोटा, बारा, बूंदी, झालावाड़, चित्तौड़गढ़ तथा भीलवाड़ा जिले में है।

राजस्थान की मिट्टियाँ व मिट्टियों के प्रकार के अंतर्गत अब हम आपको बताएंगे मध्यम आकार के कणों वाली मिट्टी के बारे में।

2. मध्यम आकार के कणों वाली मिट्टी- इस मिट्टी को भूरी, दोमट, जलोढ़, एलपीसोल्स, काॅप तथा खादर नामों से जाना जाता है। इस मिट्टी में सिल्ट की प्रधानता होती है इसलिए इस मिट्टी की जल ग्रहण करने की क्षमता तथा जल धारण करने की क्षमता लगभग समान होती है।

इस मिट्टी का निर्माण नदियों द्वारा किया गया है इसलिए इस मिट्टी में कैल्शियम, फास्फोरस, चूना पत्थर, सिलिकेट्स, पोटाश जैसे पोषक तत्व प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं।

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इसके कारण ये सर्वाधिक उपजाऊ मिट्टी है। सामान्यतः इस मिट्टी में लगभग सभी प्रकार की फसलें आसानी से उत्पादित हो जाती है फिर भी सामान्यतः राई, तारामीरा, गेहूं, जौ, चना, मटर, मसूर, आलू एवं सब्जियों के उत्पादन हेतु यह मिट्टी उपयोगी है।

राजस्थान में इस मिट्टी का फैलाव अलवर, भरतपुर, धौलपुर, करौली, सवाई माधोपुर, टोंक, दोसा तथा जयपुर जिले में है।

राजस्थान की मिट्टियाँ व मिट्टियों के प्रकार के अंतर्गत अब हम आपको बताएंगे मोटे आकार के कणों वाली मृदा के बारे में।

3. मोटे आकार के कणों वाली मृदा– इस मिट्टी को ब्लूई, बालू, रेतीली, मरुस्थलीय, अम्लीय, क्षारीय, लवणीय तथा एरिडोसोल्स आदि नामों से जाना जाता है।

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इस मिट्टी में सेंड की प्रधानता होती है इसलिए इस मिट्टी के जल ग्रहण करने की क्षमता अधिक तथा जल धारण करने की क्षमता कम होती है।

सामान्यता इस मिट्टी में नाइट्रोजन एवं फास्फोरस जैसे तत्व ठीक मात्रा में पाए जाते हैं इसलिए इस मिट्टी में मोटे अनाज वाली फसलें अच्छी पैदा होती है जिनमें जवार, ग्वार, बाजरा, मूंग, मोठ, चवला, मिर्च, इसबगोल आदि प्रमुख हैं।इस मिट्टी का फैलाव सभी मरुस्थलीय जिलों में हैं।

ये थे राजस्थान की मिट्टियाँ व मिट्टियों के प्रकार।

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